Saturday, 4 April 2015

राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आडवाणी ने भाषण देने से किया इनकार, मिले मोदी

बीजेपी के बनने के 35 सालों के दौरान महज दो बार ऐसा हुआ है कि लालकृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित नहीं किया। पारंपरिक रूप से आडवाणी बैठक में समापन भाषण जरूर देते थे। खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आडवाणी के भाषण देने से इनकार के बाद उनसे मुलाकात की है। सूत्रों के मुताबिक पीएम ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आडवाणी के मार्गदर्शन की तारीफ भी की।

इससे पहले एनडीटीवी के मुताबिक पार्टी प्रेजिडेंट अमित शाह ने आडवाणी से बीजेपी के बेंगलुरु सम्मेलन को संबोधित करने का अनुरोध किया तो उन्होंने ठुकरा दिया था। हालांकि आडवाणी के संबोधन पर आशंका पहले से ही थी।

समापन भाषण से आडवाणी के इनकार को पार्टी से मोहभंग के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि बीजेपी की टॉप लीडरशिप भी इस बात को लेकर पूरी तरह से सजग थी कि पार्टी में अलग-थलग किए जाने के बाद आडवाणी संबोधन को लेकर क्या रुख अपनाएंगे। पिछले साल अमित शाह को बीजेपी की कमान मिलने के बाद पार्टी में बड़े सांगठनिक बदलाव हुए हैं। पार्टी के सीनियर नेता आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को बीजेपी के निर्णायक मंडल पार्लियामेंट्री बोर्ड से हटाकर मार्गदर्शक मंडल में शिफ्ट कर दिया गया है। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी हैं जो कि लंबे समय से बीमार चल रहे हैं।
1980 में बीजेपी के गठन से ही ये नेता पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य थे। पार्टी में सीनियर नेताओं के प्रति सख्त व्यवहार को बीजेपी में अटल-आडवाणी युग का अंत के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर फैसले लेने में मार्गदर्शक मंडल की कोई भूमिका नहीं है। विधानसभा चुनावों में रणनीति को लेकर भी इस मंडल से कोई संपर्क नहीं किया जाता है। जब बीजेपी ने दिल्ली में किरन बेदी को बतौर सीएम कैंडिडेट प्रॉजेक्ट किया तब भी इस मार्गदर्शक मंडल से कोई संपर्क नहीं किया गया। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी से गठबंधन पर भी आडवाणी से कोई राय नहीं ली गई।

बीजेपी के दोनों दांव सफल साबित नहीं हुए। दिल्ली में किरन बेदी आम आदमी पार्टी के सामने औंधे मुंह गिरीं तो जम्मू-कश्मीर में भी पीडीपी से बीजेपी को एक साथ कई झटके मिले। इसके बाद से बीजेपी की नई कमान शाह और मोदी की जोड़ी पर सवाल उठ रहे हैं। यहां तक कि पार्टी के वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयं संघ की तरफ से भी इन मसलो पर चिंता जतायी गई।

सूत्रों का कहना है कि यदि इस सम्मेलन को आडवाणी संबोधित करते तो इन मसलों पर कई सख्त सवाल उठा सकते थे। लेकिन आडवाणी पार्टी के निर्णयों पर विरोध करने के लिए खुलकर सामने नहीं आते। अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए उन्होंने खामोशी को ही हथियार बना लिया है। आडवाणी संसद की कार्यवाही में हर दिन शामिल होते हैं लेकिन हाउस में कभी बोलते नहीं हैं। इससे पहले 2013 में भी आडवाणी ने राष्ट्रीय कार्यरकारिणी को संबोधित नहीं किया था। तब वह मोदी को प्रमोट करने के फैसले के खिलाफ गोवा सम्मेलन से बीच में ही उठकर चले गए थे। इस बार वह बेंगलुरु में मौजूद हैं लेकिन उन्होंने खामोश रहने का ही फैसला किया।

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