विधानसभा में मजबूत हो चुकी आम आदमी पार्टी अब अंदर से कमजोर हो रही है। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और प्रोफेसर आनंद कुमार राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर हो चुके हैं। इन्हें कभी अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व पूरी तरह मंजूर था। अब ये सीधे तौर पर केजरीवाल गुट के खिलाफ हैं। प्रशांत भूषण गुट के लोग तो नई पार्टी बनाने के संकेत दे रहे हैं। वहीं, जनलोकपाल के मुद्दे पर राजनीति और फिर सत्ता में आए केजरीवाल अपनी ही पार्टी के लोकपाल को हटा चुके हैं। कुल में मचा कलह अब हर दिन मीडिया के सामने आ रहा है। जानिए कैसे आम आदमी पार्टी को बनाने वाले लोग अब उसे बिगाड़ने पर तुले हैं-
आम आदमी पार्टी में कैसे बदले बड़ों के मिजाज?
1. अरविंद केजरीवाल : पहले योगेंद्र यादव को बड़ा भाई और प्रशांत भूषण को अच्छा सहयोगी मानते थे। जनलोकपाल के मुद्दे पर ही राजनीति अौर सत्ता में आए। अब कार्यकर्ताओं से कह दिया है कि या तो मुझे चुन लें या योगेंद्र और प्रशांत को।
2. योगेंद्र यादव : केजरीवाल के कमांडर-इन-चीफ कहलाते थे। लेकिन कई मुद्दों पर मतभेद को पार्टी के अंदर ही रखने में नाकाम रहे। अब आमने-सामने हैं। केजरीवाल को स्टालिनवादी कह रहे हैं।
3. प्रशांत भूषण : भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों और घोटालों से पर्दाफाश के मुद्दों पर पार्टी का प्रमुख चेहरा थे। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मीडिया में खुलकर केजरीवाल विरोधी बयान देने लगे।
4. शांति भूषण : जब पार्टी बनी तो सबसे पहले इन्होंने ही चंदा दिया। लेकिन दिल्ली के चुनाव में किरण बेदी को केजरीवाल से बेहतर सीएम कैंडिडेट बता दिया।
5. प्रोफेसर आनंद कुमार : पहले पार्टी के थिंक टैंक थे। अब उमेश सिंह के स्टिंग में केजरीवाल उनके बारे में बुरे शब्द बोलते सुने गए। कुमार पर केजरीवाल विरोधी गुट को सक्रिय करने के आरोप हैं।
अब क्या हैं चुनौतियां?
1. केजरीवाल की सीएम की कुर्सी पर असर नहीं पड़ेगा। लेकिन आम आदमी पार्टी की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचेगा। किरण बेदी, शाजिया इल्मी, मेधा पाटकर, अंजलि दमानिया जैसे बड़े नेताओं के जाने के बाद पार्टी को उनके विकल्प तलाशने होंगे।
2. प्रशांत भूषण अगर नई पार्टी बनाते हैं तो उनके लिए दिल्ली में अपनी जमीन मजबूत करना आसान नहीं होगा। कुछ विधायकों को अपने पक्ष करने पर ही वे प्रासंगिकता बनाए रख पाएंगे।
कितनी बदल गई पार्टी?
- दूसरी बार सत्ता में आने के बाद बिखराव ज्यादा है।
- पार्टी में भी हाई कमान कल्चर आ गया। केजरीवाल सब पर भारी हैं। विरोध और विरोधियों को पार्टी में जगह नहीं है।
- पार्टी में जांच अब केंद्रीय नेतृत्व के इशारे पर ही होगी।
- पारदर्शिता सिर्फ मतभेदों को लेकर है, पार्टी की अंदरूनी प्रकिया में नहीं।
आगे क्या बदलाव होगा
- दिल्ली में जबर्दस्त जीत के बाद पार्टी 2017 में राज्यसभा में अपने दो या तीन नेताओं को भेज सकेगी।
- आशुतोष, आशीष खेतान, संजय सिंह, पंकज गुप्ता और कुमार विश्वास में से किसी तीन को मौका मिल सकता है।
- पार्टी 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में उतर सकती है। संजय सिंह को कमान दी जा सकती है। पार्टी का नया स्लोगन होगा- 'दिल्ली में दिखाया दम, अब यूपी में आ गए हम'।

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