Thursday, 2 April 2015

मोदी के कट्टर समर्थक की बोली पर महाभारत

किसी नेता का कट्टर समर्थक किसे कहते हैं आज के दौर में गिरिराज सिंह उसके सबसे सफल उदाहरण हैं. केंद्र में मंत्री बनने से पहले गिरिराज सिंह की पहचान नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक के तौर पर थी. नरेंद्र मोदी का जहां भी विरोध होता गिरिराज सिंह चट्टान की तरह खड़े हो जाते. लेकिन सोनिया गांधी के बारे में दिया गया एक बयान उनपर आज भारी पड़ रहा है. हालांकि विवाद बढ़ने के तुरंत बाद बयान पर उन्होंने खेद भी जता दिया है.गिरिराज जब तक बिहार में थे तब तक उनके बयानों और विवादों की बात इतनी दूर तक नहीं जाती थी. लेकिन केंद्रीय राजनीति में आने के बाद उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है. फिर भी ऐसी बातें बोलकर अपनी छीछालेदार करवाना उनके बायोडाटा में शामिल होता जा रहा है.

गिरिराज सिंह को जानने वाले बताते हैं कि वो मुंह के जितने ठेठ और देसी हैं दिल के उतने ही साफ. लेकिन उस साफगोई का मतलब ही क्या जब जुबान से कड़वी और विवादित बातें निकलती हो. आज की तारीख में गिरिराज के बयान पर विवाद इसलिए भी बड़ा हो जाता है क्योंकि निकट भविष्य में बिहार में विधानसभा के चुनाव होने हैं. गिरिराज सिंह अब बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं में से एक हो चुके हैं. मतलब उनकी सोच और उनकी बोली पार्टी, वोटर और समर्थकों को भी प्रभावित करेगी. बीजेपी की सरकार बनने के बाद बिहार में खुद को गिरिराज अगला मुख्यमंत्री मान रहे हैं. मानने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन ऐसा वाकई में संभव हो पाएगा ये किसी ख्वाब से कम नहीं है.

अभी कल ही उन्होंने बयान दिया है कि बिहार में चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि चर्चा सुशील मोदी को लेकर चल रही है. बिहार में सुशील मोदी विरोधी खेमे को गिरिराज सिंह ही लीड कर रहे हैं. जिस सामाजिक समीकरण के तहत गिरिराज यहां तक पहुंचे हैं वही सामाजिक समीकरण बिहार में उनके लिए रोड़ा है.

गिरिराज सिंह भूमिहार जाति से आते हैं. बिहार में भूमिहार वोटरों की आबादी महज 5 फीसदी है, लेकिन 5 फीसदी भूमिहार करीब 15-20 फीसदी वोट बैंक पर असर डालते हैं. अभी बीजेपी वोट बैंक पर बीजेपी की अच्छी पकड़ है. नीतीश कुमार भी इस वोट बैंक को अपने साथ रखना चाहते हैं. बिहार के 40 में से 4 सांसद भूमिहार जाति के हैं. दो बीजेपी से एक एलजेपी और एक आरएलएसपी के. गिरिराज सिंह पार्टी के अंदर फॉरवार्ड लॉबिंग कर रहे हैं. यानी भूमिहार के साथ राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ नेताओं की भी राजनीति. जिनकी यहां कुल आबादी करीब 15 फीसदी है. ब्राह्मण जाति के जगन्नाथ मिश्रा बिहार के आखिरी सवर्ण मुख्यमंत्री थे. इसके बाद लालू, राबड़ी, नीतीश, मांझी सीएम बने. बिहार में तमाम पार्टियों में वचर्स्व अभी पिछड़ी जाति के नेताओं का ही है. लालू आरजेडी के, नीतीश जेडीयू के, सुशील मोदी और नंद किशोर बीजेपी के, उपेंद्र कुशवाहा आरएलएसपी के, रामविलास पासवान (दलित) एलजेपी के, सदानंद सिंह और अशोक चौधरी कांग्रेस के. यानी तमाम पार्टियों में जो स्टेट लीडरशिप है वो पिछड़ी जाति के नेता हैं. इनमें से गिरिराज सिंह वो नेता हैं जो स्टेट से उठकर केंद्र की राजनीति में पहुंचे हैं और जिनकी नजर बिहार की कुर्सी पर है. बिहार में गिरिराज सुशील मोदी विरोधी खेमे के हैं. गिरिराज सिंह जिस नवादा सीट से सांसद हैं. वहां से जब पार्टी ने उन्हें टिकट दिया तब खूब ड्रामा हुआ. गिरिराज नवादा की जगह बेगूसराय से लड़ना चाहते थे. लेकिन पार्टी ने उन्हें नवादा से ही लड़ने को कहा. ना-ना करते गिररिराज लड़े और 3 लाख 90 हजार वोट पाकर करीब डेढ लाख से जीत गए. पहली बार में मंत्री नहीं बने लेकिन नरेंद्र मोदी ने जब कैबिनेट विस्तार किया तो गिरिराज को मंत्री बना दिया. अभी गिरिराज सिंह लघु उद्योग राज्यमंत्री हैं.

बयान के नफे-नुकसान

लोकसभा चुनाव के दौरान भी गिरिराज सिंह विवादों में घिरे थे. झारखंड की एक चुनावी सभा में 19 अप्रैल को उन्होंने मोदी विरोधियों को पाकिस्तान चले जाने की बात कही थी. इसकी प्रतिक्रिया ये हुई कि इस बयान के ठीक अगले दौर में 24 अप्रैल को बिहार की जिन जिन सीटों पर लोकसभा चुनाव की वोटिंग हुई सभी की सभी 7 सीटें बीजेपी हार गई. भागलपुर से शाहनवाज हुसैन, कटिहार से निखिल चौधरी, बांका से पुतुल देवी और पूर्णिया से पप्पू सिंह वैसे दिग्गज नेता थे जिनकी जीत तय मानी जा रही थी. लेकिन गिरिराज के एक बयान ने सीमांचल और भागलपुर का सियासी समीकरण ही बदल दिया और उस दौर की सात की सात सीटें बीजेपी जीतते जीतते हार गई. नतीजों के बाद कराए गए सर्वे में ये बात निकलकर आई कि मुस्लिम वोटरों ने बीजेपी के खिलाफ एक तरफा और एग्रेसिव होकर वोट कर दिया.सांसद बनने के बाद गिरिराज पैसे को लेकर भी एक विवाद में फंस गये थे. पटना में उनके फ्लैट से करोड़ों की चोरी हुई थी. केस लाखों की चोरी का ही दर्ज कराया गया. बरामदगी हुई तो करोड़ों रुपये मिले. आयकर की जांच हुई और तब साफ हुआ कि पैसे गिरिराज सिंह के चेचेरे भाई के हैं.

बिहार के बड़हिया के रहने वाले गिरिराज सिंह पहली बार सांसद बने हैं. लखीसराय जिले का बड़हिया भूमिहार बहुल गांव है. सांसद बनने से पहले गिरिराज विधान परिषद के सदस्य थे. 2002 में पहली बार वो सदन में पहुंचे थे. किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले आरएसएस की पृष्ठभूमि के गिरिराज बिहार की नीतीश सरकार में दोनों बार मंत्री रहे. यानी 2005 से 2013 तक जब तब बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन रहा तब तक गिरिराज मंत्री रहे. नीतीश के मुख्यमंत्री रहते हुए भी गिरिराज बिहार में मोदी का अकेला खूंटा थामे हुए थे. उस दौर में भी जब सुशील मोदी नरेंद्र मोदी के पक्ष में खुलकर खड़े होने की हिम्मत नहीं करते थे. नरेंद्र मोदी ने इस वफादारी का ईनाम भी उन्हें दिया. लेकिन मोदी के कट्टर समर्थक गिरिराज अपने विवादित बयानों की वजह से एक बार फिर विवादों में हैं.

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