रायपुर. राजधानी शहर रायपुर की आबादी वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक 21 लाख 60 हजार 876 है. अगर शहर की रसोई गैस एजेंसियों के आंकड़ों की मानें तो यहां तीन लाख से कुछ ही अधिक परिवार हैं, जिनके पास रसोई गैस सिलिंडरों के कनेक्शन मौजूद हैं. अगर एक परिवार में औसतन चार सदस्य भी हों तो रसोई गैस की सुविधा बमुश्किल 12 लाख लोगों को मिल रही है. शेष 9 लाख से अधिक की आबादी अपने रोजमर्रे का काम कैसे चला रही है? इससे अधिक जरूरी सवाल यह कि जिन लोगों के पास रसोई गैस सिलिंडर के कनेक्शन मौजूद हैं, क्या उन्हें गैस एजेंसियों की सेवाओं से पूरा संतोष है? इस सवाल का उत्तर स्वाभाविक कारणों से मिला-जुला ही आता है.
गौरतलब है कि राजधानी समेत रायपुर जिले में कुल 32 गैस एजेंसियां कार्यरत हैं. यह लगभग 3 लाख 63 हजार 878 कनेक्शनधारियों को अपनी सेवाएं देती हैं, जिनमें से 2 लाख 54 हजार 846 डबल और 1 लाख 9 हजार सिंगल सिलिंडर वाले कनेक्शनधारी हैं. बीते वित्त वर्ष 2014-15 में 1 लाख 94 हजार 247 कनेक्शन जारी किए गए. इन कनेक्शनधारियों में से अधिकांश का कहना है कि रायपुर में कोई गैस प्लांट नहीं होने के कारण उन्हें गैस सिलिंडरों की आपूर्ति करने में एजेंसियां बहुत देर लगाती हैं. कभी ओडिशा में हुदहुद तूफान तो कभी विशाखपत्तनम में किसी अनदेखी समस्या के चलते ग्राहकों को बीसियों दिनों तक गैस सिलिंडर पहुंचने का इंतजार करना पड़ता है. गैस एजेंसियों को यह आरोप स्वीकार करने में कोई आपत्ति में भी नहीं है. उनका कहना है कि अगर उन्हें गैस कंपनियों से सही वक्त पर सिलिंडर मिल जाएं तो वह अपने ग्राहकों को सिलिंडरों का इंतजार नहीं करवाते हैं.
बहरहाल, एजेंसियों से एक अन्य शिकायत अधिक गंभीर है. यह शिकायत आम तौर पर गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवार अधिक करते हैं. इन परिवारों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने जब से सिलिंडरों की सब्सिडी सीधे उनके बैंक खातों में जमा करवाने के लिए बैंक खातों को उनके आधार यूआईडी नंबर से जोडऩे का नियम बनाया है, तब से उनकी मुश्किलें बढ गई हैं. गैस डीलर्स उन बीपीएल उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाले सिलिंडरों की आपूर्ति करने से इन्कार करते हैं, जिन्होंने अपने बैंक खातों में आधार नंबरों की सीडिंग अब तक नहीं की है. यह सिलिंडर कथित रूप से खुले बाजार में ऊंची कीमतों पर बेचे जाते हैं. यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से किसी शासकीय सेवा के हितग्राही को सिर्फ इसलिए आवश्यक सेवा देने से इन्कार नहीं करने को कहाथा कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है.
डीलरों ने खारिज की शिकायत
वहीं, गैस एजेंसियों और डीलर्स को इस शिकायत को सिरे से खारिज करने में देरी नहीं लगती. इनका कहना है कि रसोई गैस की आपूर्ति करने वाली कंपनियों में कई कंपनियां ऐसी हैं जिन्हें सार्वजनिक उद्योगों के नवरत्न का दर्जा मिला हुआ है. इनकी पूरी आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शी है. एचपी, बीपी और इंडेन जैसी कंपनियों ने आपूर्ति प्रक्रिया पर नजर बनाए रखने के लिए ऑनलाइन व्यवस्थ विकसित कर ली है. इसके होते हुए गैस डीलर्स या एजेंसियां किसी प्रकार की अनियमितता नहीं बरत सकती हैं. शहर के मोतीबाग इलाके में स्थित गैस हाउस के स्वामी अब्दुल हमीद हयात का कहना है कि इस समय ग्राहकों का हक मारकर गैस सिलिंडरों की कालाबाजारी कर पाना लगभग नामुुमकिन है. इसकी वजह यह है कि कंपनियों से गैस डीलर्स को जितने सिलिंडरों की आपूर्ति की जाती है, डीलर्स को उतने ही बिल कंपनियों को दिखाने पड़ते हैं.
इंडेन गैस कंपनी का भी दावा है कि बीपीएल परिवारों को सब्सिडी के सिलिंडर देने के बजाय उन्हें भारी दाम पर काले बाजार में बेचना पुराने दिनों का खेल हो चुका है. ऐसा करना अब संभव नहीं है. कंपनी के जनसंपर्क अधिकारी पारस बगरिया का कहना है कि हर इंडेन गैस डीलर को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि वह अपनी दुकान के बाहर अपना नाम और मोबाइल फोन नंबर इस प्रकार से डिस्प्ले करें कि ग्राहकों को अपनी शिकायत दर्ज करवाने में परेशानी न हो. उन्होंने दावा किया कि प्रशासन की तरफ से इन दिनों बीपीएल परिवारों के कल्याण पर इतना अधिक ध्यान दिया जा रहा है कि कोई गैस एजेंट या डीलर उन्हें सब्सिडी के सिलिंडरों से वंचित नहीं कर सकता. बहरहाल, उन्हें यह स्वीकार करने में आपत्ति नहीं है कि आपूर्ति श्रृंखला बेहतर बनाने वाले सॉफ्टवेयर को लगातार नया रूप दिए जाने से उपभोक्ताओं के सामने कुछ दिक्कतें पेश आती हैं.

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