Tuesday, 31 March 2015

पहली बार 18 घंटे के नवजात की हार्ट सर्जरी

राजधानी के फोर्टिस हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने जन्म के मात्र 18 घंटे बाद एक नवजात की ओपन हार्ट सर्जरी का कमाल कर दिखाया है। डॉक्टरों के अनुसार देश के चिकित्सा इतिहास की यह पहली घटना है। मयंक अग्रवाल का जन्म दिल की गंभीर बीमारी के साथ हुआ। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार उसे टोटल एनोमेलस पल्मनरी वेनस कनेक्शन (टीएपीवीसी) बीमारी थी।
फोर्टिस एस्कार्ट्‌स हार्ट इंस्टीट्यूट के शिशु व नवजात हृदय रोग विभाग के कार्यकारी निदेशक डॉ. केएस अय्यर ने बताया कि इस बीमारी में खून फेफड़े से होकर दिल व शरीर तक सामान्य रास्ते से नहीं पहुंचता है। फेफड़े से दिल की नसें असामान्य ढंग से जुड़ी होती हैं। इतना ही नहीं ये नसें पतली और खून को रोक कर रखती हैं। फेफड़े से ऑक्सीजन युक्त खून या तो इन नसों में जाता है या लीक होकर गलत चेंबर में जमा हो जाता है और फेफडे में अवरुद्ध हो जाता है।
नीला पड़ जाता है शरीर
डॉ. अय्यर ने बताया कि महाधमनी (एरोटा) के जरिए शरीर तक पहुंचने वाले खून में ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा नहीं होती है, जिससे बच्चा निश्‍चेत हो जाता है तथा उसका शरीर नीला पड़ जाता है। इसी अवस्था में आपात सर्जरी कर बच्चे की जान बचाई जा सकती है।
मथुरा में हुआ था जन्म
नवजात मयंक का जन्म मथुरा में हुआ था। उसके जन्म के चंद मिनट में ही उसके श्वसन तंत्र में बड़ी बाधा पता चली थी। स्थानीय डॉक्टर उसका इलाज करने में असमर्थ थे, उन्होंने उसे सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल ले जाने की सलाह दी थी। इस पर उसके परिजन उसे दिल्ली लेकर आए।
चेस्ट खोलकर सर्जरी
फोर्टिस हॉस्पिटल लाते ही डॉक्टरों ने मयंक की ओपन हार्ट सर्जरी का फैसला किया। इसमें उसका चेस्ट (सीना) खोलकर दिल मांसपेशियों, वॉल्व धमनी की सर्जरी की गई। सर्जरी के बाद भी चेस्ट तीन दिन तक ओपन रखा जाता है, इसलिए सर्जरी के बाद की चुनौतियां भी उतनी ही रहती हैं। मयंक की हालत अब सामान्य शिशु की तरह है।
उम्मीद खो चुके थे
मयंक के पिता गोपाल अग्रवाल ने बताया कि हमारे परिवार में 28 वर्ष बाद बच्चे के जन्म की खुशी मिली है। यह खुशी इसलिए भी चौगुनी है, क्योंकि हम मयंक के बचने की उम्मीद खो चुके थे।
-दुनिया में प्रति हजार नवजात शिशुओं में हृदय रोग की संख्या 8 से 10 फीसदी है, जबकि भारत में 6 से 8 फीसदी है। 
-भारत में हर साल 1.80 लाख बच्चे हृदय रोग के साथ जन्म लेते हैं। उन्हें पहले वर्ष में ही इलाज की जरूरत होती है।
-इनमें से 60 से 90 हजार बच्चों में रोग गंभीर होता है, जिनका जल्दी इलाज जरूरी होता है।

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