Saturday, 9 May 2015

युद्घ छिड़ा तो 20 दिन में खत्‍म हो जाएगा सेना का गोला-बारूद

तीन दशक पुराना एलसीए प्रोजेक्ट ----कैग की नई रिपोर्ट भारतीय सेना की संकटपूर्ण स्थिति की ओर इशारा करती है। कैग ने कहा है कि सेना के पास पर्याप्‍त मात्रा में गोलाबारूद नहीं है। 

गोलाबारूद प्रबंधन पर दी गई रिपोर्ट मे कैग ने कहा है कि सेना संकट से गुजर रही है, उसके पास गोलाबारूद इतनी कम मात्रा है कि युद्घ के हालात में वे मुश्किल से 20 दिनों तक भी लड़ पाएंगे। कैग का कहना है कि सेना को कम से कम 40 दिनों तक युद्घ लड़ने भर का गोलाबारूद जरूरी है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च, 2013 तक सेना के पास इतने गोला बारूद भी नहीं थे कि युद्घ के हालात में लंबे समय तक संघर्ष कर सके। कैग ने हल्के लड़ाकू व‌िमान तेजस पर भी सवाल उठाया है।
तीन दशक से चल रहे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) प्रोजेक्ट तेजस पर कैग ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बेहद कड़े शब्दों में कैग ने कहा है कि इसके मार्क-1 वर्जन में कई खामियां हैं और यह भारतीय वायुसेना के मानदंडों पर खरा नहीं उतरता।

संसद में रखी गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के मुताबिक, वायुसेना एक प्रशिक्षक मॉडल की उपलब्धता के बिना एलसीए को शामिल करने के लिए मजबूर होगी और ‘इससे पायलट प्रशिक्षण पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

कैग ने कहा कि एलसीए के निर्माण और आपूर्ति में देरी की वजह से वायुसेना को कई वैकल्पिक अस्थायी कदम उठाने पड़े। इनमें मिग 20,037 करोड़ रुपये की लागत से बीआईएस, मिग-29, जगुआर और मिराज जैसे विमानों को अपग्रेड करना और मिग-21 विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर पुनर्विचार करना शामिल है।
प्रोजेक्ट की खामियां गिनाते हुए कैग ने कहा कि एलसीए मार्क-1 वायुसेना द्वारा बताई गई इलेक्ट्रानिक युद्धक क्षमताएं पूरी करने में नाकाम रहा क्योंकि जगह की कमी के चलते विमान में आत्मरक्षा जैमर नहीं लगाया जा सका।इसके साथ ही, विमान में फिट किए गए रडार वार्निंग रिसीवर/काउंटर मेजर्स डिस्पेंसिंग सिस्टम ने भी इसके प्रदर्शन से जुड़ी चिंताओं को बढ़ाया है।

इनका समाधान होना अभी शेष है। कैग के मुताबिक,एलसीए के मार्क-1 को शुरुआती ऑपरेशनल क्लीयरेंस दिसंबर 2013 में दिया गया था। लेकिन यह एयर स्टाफ की जरूरतों (एसएसआर) से काफी पीछे रह गया। 

कैग के मुताबिक, मार्क-1 की खामियां मार्क-2 मॉडल में पूरी होने की उम्मीद है। इन खामियों में वजन, ईंधन क्षमता में कमी, ईंधन प्रणाली की सुरक्षा का पालन न करना शामिल है। एलसीए का मार्क-2 मॉडल सन 2018 तक आने की उम्मीद है।
1983 में 560 करोड़ रुपये की लागत से स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमानों के निर्माण की परियोजना को� मंजूरी दी गई थी। समय-समय पर बढ़ोत्तरी के चलते यह 10397.11 करोड़ रुपये पहुंच गई।इस प्रोजेक्ट के तहत 1994 तक वायुसेना में 220 हल्के लड़ाकू विमानों को शामिल किया जाना था।

इनमें से 200 फाइटर प्लेन और 20 ट्रेनी विमान थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी एलसीए दिसंबर 2013 में बस शुरुआती ऑपरेशनल क्लीयरेंस ही हासिल कर सका।

जबकि इसके लिए दिसंबर 2005 की डेडलाइन थी। एलसीए को दिसंबर 2008 तक फुल ऑपरेशनल क्लीयरेंस हासिल करना था। यह टॉरगेट भी पूरा नहीं हो पाया। अब इसके लिए दिसंबर 2015 की समयसीमा तय की गई है।

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