अधिकारी ने इस अवार्ड के प्रशस्ति के मसौदे के हवाले से कहा, ‘मुक्ति संग्राम (1971 में) की शुरुआत से ही वाजपेयी बांग्लादेश की आजादी के प्रबल पक्षधर थे। तब उन्होंने तत्कालीन भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष और लोकसभा सदस्य के तौर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश के लोगों के अधिकारों के लिए मुहिम चलाई थी।’
अधिकारी ने यह भी बताया कि इसके साथ ही प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेश की आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले भारतीय सशस्त्र बलों के परिजनों को सम्मानित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी । इस प्रस्ताव में यह कहा गया है कि यह बांग्लादेश की ‘राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ है कि वह भारतीय सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान के लिए उनका औपचारिक रूप से शुक्रिया अदा करे।
अधिकारी ने यह भी बताया कि इसके साथ ही प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेश की आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले भारतीय सशस्त्र बलों के परिजनों को सम्मानित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव में यह कहा गया है कि यह बांग्लादेश की ‘राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ है कि वह भारतीय सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान के लिए उनका औपचारिक रूप से शुक्रिया अदा करे।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि ढाका ने शहीद भारतीय सैनिकों के परिजनों बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के दस्तखत वाले एक सर्टिफिकेट के साथ एक पत्र भेजने का भी फैसला लिया है। इसमें इन भारतीय सैनिकों के योगदान के लिए उनका आभार जताया जाएगा। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीया इंदिरा गांधी पहली ऐसी ‘विदेशी दोस्त’ थीं जिन्हें� ‘बांग्लादेश लिबरेशन वार ऑनर अवॉर्ड’ से नवाजा गया था। उनकी ओर से उनकी पुत्रवधू और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने 2012 में एक विशेष समारोह में यह अवार्ड ग्रहण किया था।
इसके बाद यह पुरस्कार पाने वालों में ज्यादातर भारतीय हैं, जिन्होंने बांग्लादेश की आजादी में अहम रोल अदा किया। भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी इनमें से एक हैं। अवामी लीग के 2008 में सत्ता संभालने के बाद से बांग्लादेश ने 1971 के ‘विदेशी मित्रों’ को सम्मानित करने का फैसला किया है।
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